Tuesday, February 11, 2014

मुन्फ़सिल राहें

कहाँ दूर हुई थी मैं कभी  ?
अलग तुने ही मुझे खुद से कर दिया...
आखों में मेरे नमी है अभी भी
क्यूँ तूने मुझे यूँ बेवफा कहा ?

अश्कों से लड़ लड़ कर मैं 
मुस्कुराते रही तेरे इंतज़ार में ,
मेरी उस झूठी मुस्कान को देख
"वो खुश है " करार तूने दिया ..

कितना रोकती मैं आख़िर तुझे ?
दूर चला जा रहा था तू
रास्ते तो बदल ही दिए थे तूने
मीलों के फ़ासले बना रहा था तू ..

कभी सोचती हूँ तो लगता है
क्या परेशान तू मुझसे था या मेरी ख़ुशी से ?
तुझे तो खुश ही देखना चाहती थी मैं
दुखी थी सिर्फ तेरी बेरुख़ी से ..


अब मुझे नहीं इंतज़ार किसी का
प्यार जो तूने मेरा ठुकरा दिया
क़दम बढ़ा दिए है अब मैंने भी अपनी मंजिल की तरफ़
मुड़ ना पाउंगी अब तेरी ओर..


अब ये खुदा की मर्ज़ी थी या कायनात की ?
ये तो नहीं जानती मैं
अलग है मंजिल -ए - ज़िन्दगी की दास्तान शायद
जो इश्क हमारा कुर्बान किया | 

Saturday, February 1, 2014

In the realm of my senses

In the realm of my senses it is you...
I wanna touch those gazes
I wanna show those facets 
those glimpse of something happening 
is yet to be defined.
I have been forced
I am elocuted to the desire of Destiny
I have been fired by the rays of hope
I was never diligent before
I was never for you.
It was a beautiful escape
It was astounding and incredible
I owe you 
I owe your stay in my Life.
If I could drag something from 
the Tides of my Life 
I will bring back the time 
I spent with you :)